नन्हीं परी

शुश……………………..शुश………………….

सुनो

दिल्ली की एक सुनसान सड़क

सड़क किनारे पड़ा एक कचरे का ढेर

भोर के अंधेरे में

न मालूम कोई दरिन्दा

या फिर कोई मजबूर मासूम

चुपचाप दबे पाँव आता है

और सड़क किनारे कचरे के ढेर पर

एक कपड़े का नया बैग

छोड़कर चला जाता है

सुबह होती है सूरज निकलता है

और फिर देखते – देखते दिन चढ़ता है

दो मासूम स्कूल जाने के बजाय

रैग पिक करने के लिए ऐसे

जैसे अपनी टूटी, बिखरी हुई

जिंदगी को समटने के लिए

घर से निकल पड़ते हैं

रस्ते में एक – एक कागज,

एक – एक प्लास्टिक अथवा

किसी अन्य वस्तु का टुकड़ा

चुनते हुए झोली में डालकर

पहुँच जाते हैं कचरे के ढेर पर

जैसे वहाँ उन्हें उनकी

खोई जिंदगी मिल जायेगी

रैग को चुनते – चुनते

अकस्मात उनकी नजर

कचरे के ढेर पर पड़े

एक कपड़े के बैग पर

पड़ जाती है

सहम जाते हैं मासूम दोनों

सोचते हैं की यह क्या है

कचरे का ही हिस्सा है यह

या फिर उनके लिए धरोहर

बैग को उठाने की हिम्मत

मासूम नहीं कर पाते हैं

और बुला लाते हैं वहाँ

कुछ बड़े लोगों को

जो देख कर बैग को सोचते हैं

और फिर डर जाते हैं यों

बैग के अंदर बम समझकर

बुला लाते हैं पुलिस को वहाँ

पुलिस भी बम निरोधक दस्ता

लेकर पहुँच जाती हैं वहाँ

बम निरोधक दस्ता अपनी

दिखाते हुए कुशल निपुणता

कपड़े के बैग को खोलते हैं

कपड़े के बैग के अंदर कपड़े

कपड़ों से एक नन्हीं नवजात की

मासूम आवाज सुनाई देती है

यह क्या ? देखकर सभी

घोर अचंभा करते हैं

जैसे पूछ रहे हों नवजात से

कैसे यहाँ तुम आई,

कौन तुम्हें यहाँ छोड़ गया

दिल नहीं कांपा उसका

जो इतना कठोर बन गया

नन्हीं सी जान जिसने अभी – अभी

थी आँखें खोलीं

बोलने से थी लाचार मगर

अपनी नजरों से फिर यों बोली

नहीं पता है कुछ भी मुझको

किसने मुझको जन्म दिया

क्या थी मजबूरी उनकी

जो मुझको यहाँ पर छोड़ दिया

शायद कोई दरिन्दा होगा

जिसने अपनी हवश मिटाई होगी

बिना किये परिणाम की चिंता

कोई अबला नारी सताई होगी

या होंगे कोई धर्म, समाज के मारे

या फिर शर्म उन्हें तो आई होगी

या फिर मैं हूँ परिणाम किसी के

अनुपम प्यार की

पर नहीं रही होगी हिम्मत

धर्म, समाज से लड़ने की

और छोड़ दिया फिर मुझको

मेरे अपने करम पर

वो डरपोक समाज से लड़ न सके

पर मैं तो बनकर वीर लड़ी हूँ

जीवन नहीं हारा मैने

क्योंकि मैं तो एक नन्हीं पारी हूँ

ऐसी सुन आवाज परी की

पुलिस झट – पट दौड़ पड़ी

और फिर दिल्ली एम्स में जाकर

डॉक्टर से यों बात करी

बचा लीजिए इस नन्हीं को

यह नन्हीं सी जान परी

देखकर इस नन्हीं की हालत

डॉक्टर फिर दौड़ पड़े

जान बचाने की खातिर

किये उन्होनें जतन बड़े

खबर सुनने तक ये नन्हीं

स्वास्थ्य लाभ करती है

बड़ी हिम्मत वाली है ये

नहीं मौत से डरती है

कपड़े और बैग को लेकर

पुलिस वाले भी चल पड़ते हैं

पता लगाने उन मां – बाप का

जो घृणित कार्य ऐसा करते हैं

कहती है तब नन्हीं उनसे

मत खोजो तुम उनको

जो धर्म, समाज से डरते हैं

मत खोजो तुम उन अय्याशो को

जो ऐसे घृणित कार्य करते हैं

नहीं जरूरत उनकी मुझको

मैं तो वीर बड़ी हूँ

मुझे ले जायेगा मानव कोई

क्योंकि मैं तो एक नन्हीं परी हूँ

मैं तो एक नन्हीं परी हूँ

हरी सिंह किन्थ

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