नेता

नेता नहीं शासक हैं ये

प्रशासक नहीं शोषक हैं ये

नेता तो जनता का नेतृत्व किया करते हैं

ये शासक हैं जनता पर राज किया करते हैं

कहने को तो देश सबसे बड़ा लोकतंत्र है

पर यहाँ पर सबसे बड़ा भृष्ट तंत्र है

जहाँ देखो जिधर देखो बस लुटेरे ही लुटेरे हैं

हर गली, हर मुहल्ला बस इनके ही फेरे हैं

जनता को लूट कर इन्होनें अपनी कोठियाँ भरी हैं

चाहे जिस काल में देखो बस जनता ही मरी है

देश को लूटकर इन्होनें किया सफाया है

देश का धन विदेशों में जमा कराया है

नेताओं की तो बस बात ही निराली है

कोठियाँ भरी हैं इनकी जनता का घर खाली है

महान की पदवी नेताओं को दी जाती है

महान तो जनता है जो सदैव पीसी जाती है

ऐशो आराम में नेताओं का जवाब नहीं

धन दौलत का इनके यहाँ कोई हिसाब नहीं

लूटने के इनके तरीके भी कितने निराले हैं

प्रशासक, पूंजीपति सब इनके पाले हैं

बातें बनाने में इनका कोई सानी नहीं है

नेताओं का काटा मांगता पानी नहीं है

धर्म के नाम पर ये जनता को लड़ाते हैं

जाति और क्षेत्र के नाम पर उनको भिड़ाते हैं

भाषा के नाम पर ये जनता को बांटते हैं

जनता को भिड़ाकर ये अपनी फसल काटते हैं

आम आदमी ट्रेन में लटककर सफर करते हैं

ये एयर कंडीशंड कोच में ऐश करते हैं

आम आदमी आसमान में हवाई जहाज उड़ता देखते हैं

पर पैसे वाले हवाई जहाज से अदभुत नजारे देखते हैं

जितनी भोली जनता है उतना चालाक ये नेता है

जनता तो भूखों मरती ये सब कुछ उनका लेता है

कॉरपोरेट जगत है इनका ये कॉरपोरेट जगत के हैं

सारी जनता मछली जैसी ये बगुला भगत से हैं

पार्टियाँ हैं अनेक इनकी अनेक पार्टी हैं एक

सरकार चाहे जिसकी हो ये सारे ठग हैं एक

कितना सुनायें इनकी कहानी

भृष्टाचार, अनाचार पोषक हैं ये

नेता नहीं शासक हैं ये

प्रशासक नहीं शोषक हैं ये I

हरी सिंह किन्थ

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