वह निश्चित ही मजदूर है

मेरे सामने खड़ा जो मौन है,

भला बताओ तो, यह कौन है ?

इसके जीवन में धूप ही धूप है, मगर उजाला नहीं

इसके जीवन में घुप्प अंधेरा है, मगर दिल कला नहीं

आँखों में इसके मोती ही मोती है, मगर गले में माला नहीं

यह संसार का निर्माण करता है, मगर अपना नहीं

यह सबके सपने पूरे करता है, मगर इसका कोई सपना नहीं

यह सबका जीवन दाता तो है, मगर इसका कोई जीवन नहीं

यह सबके घर बनाता है, मगर इसका कोई घर नहीं

यह सबको सुख और खुशियाँ लुटाता है, पर खुद उनसे बहुत दूर है

चुपचाप खड़ा, आँसू बहाता, यह निश्चित ही मजदूर है

यह निश्चित ही मजदूर है ।

खेत जिससे लहलहाते हैं, कल – कारखाने जिनसे चलते हैं

लोहे की पटरियों पर तेज रफ्तार से, रेलगाड़ियाँ सरसराती हैं

चौड़ी-चौड़ी सड़कों पर, मोटर गाड़ियाँ और कारें सरपट दौड़ती हैं

जिससे रौशन होते हैं घर, आंगन सबके, वो बिजली

जिसके आने पर सबकी जिंदगी चल पड़ती है

और जब वह जाती है तो मानों सबकी साँसें ही रुक जाती हैं

वह बिजली जिससे है, बिजली ही क्या, दुनियां जिससे है

यह खून पसीना और अस्थियाँ है उसकी,

वह कोई और नहीं, बल्कि मजदूर है –

वह निश्चित ही मजदूर है ।

हरी सिंह किन्थ

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