ऐसा साहित्य लिखो

ऐसा साहित्य लिखो,

भिक्षु को देखो ।

वह जाता,

दो भाग कलेजे के करता, पछताता पथ पर जाता ।

आँत, पेट, पीठ मिलकर हैं एक,

जा रहा है लाठी टेक,

मुट्ठी भर दाने को – पेट भर खाने को,

अरे तू देख मनुज वह जाता,

दो भाग कलेजे के करता, पछताता पथ पर जाता ।

अरे सूरत है कितनी भोली,

पड़ी कंधे पर एक फटी-पुरानी झोली,

उठें हिलोरें मन में – लगी है आग तन में,

मुंह बाये वह जाता,

दो भाग कलेजे के करता, पछताता पथ पर जाता

पहने एक कुर्ता,

देख दौरें कुत्ता,

कुछ बाँह है कटी – कुछ पीठ भी है फटी,

तन काँपता, थर्राता,

दो भाग कलेजे के करता, पछताता पथ पर जाता ।

पहुँचा एक सज्जन के यहाँ,

बैठे थे बहुजन वहाँ,

देख टूटे तन को,

सज्जन है भगाता,

दो भाग कलेजे के करता, पछताता पथ पर जाता ।

देख उस भिक्षुक की दशा,

जमाना फिर उस पर हँसा,

अरे ओ जमाने – तू समझ अपने समाने,

देख ‘हरी’ वह जाता,

दो भाग कलेजे के करता, पछताता पथ पर जाता ।

भिक्षुक देख अपनी दुर्दशा,

भाग अपने पर हँसा,

तू देख ईश्वर मुझे अहा – बहुत कुछ है मैंने सहा,

‘हरी’ अब सहा न जाता,

दो भाग कलेजे के करता, पछताता पथ पर जाता ।

साधु को देखो,

भिक्षु को देखो,

ऐसा साहित्य लिखो ।

हरी सिंह किन्थ

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