प्रकृति

प्रकृति ही सब कुछ है

सब कुछ प्रकृति है

प्रकृति अपने आप में परिपूर्ण है

प्रकृति सत्य और संपूर्ण है

प्रकृति के कुछ भी नहीं है परे

क्योंकि जो कुछ भी है मौजूद

सभी कुछ प्रकृति ही है

मूल कारण प्रकृति है

समस्त कारण प्रकृति है

सभी कार्य होते हैं प्रकृति के अधीन

और कार्यों का परिणाम भी प्रकृति है

मानव समाज स्वयं

अन्य समाज की तरह

प्रकृति का एक अंग है

हम कहते है ज्ञान जिसे

वह ज्ञान प्रकृति का गुण मात्र है

मानव जो भी प्राप्त करता है ज्ञान

वह सब प्रकृति या उसके किसी अंग से

अथवा उसके सूक्ष्मतम कण से

ही प्राप्त करता है

साधन भी प्रकृति है

साध्य भी प्रकृति है

कर्ता भी प्रकृति है

क्रिया भी प्रकृति है

कर्म भी प्रकृति है

उसका फल भी प्रकृति है

कर्मफल भोग भी

प्रकृति का ही गुण है

मनुष्य जो भी करता है

वह प्रकृति के अंदर

प्रकृति के द्वारा ही करता है

प्रकृति एक पुस्तक है महानतम

प्रकृति एक पुस्तक है विशालतम

यह समस्त कार्यों के सम्पादन

करने वाली स्वयं अपने आप में

एक अनुपम प्रयोगशाला है

प्रकृति ही ज्ञान है

प्रकृति ही विज्ञान है

वैज्ञानिक भी स्वयं प्रकृति ही है

विज्ञान के सभी सिध्दान्त

मनुष्य ने प्रकृति के अंदर

प्रकृति की प्रयोगशाला में

प्रयोग कर ही सिध्द किये हैं

मानव समाज का संपूर्ण ज्ञान

इतिहास और विज्ञान

सभ्यता और संस्कृति

सभी कुछ तो है प्रकृति

मनुष्य जो भी है सीखता

समाज और प्रकृति से ही सीखता

धूर्त हैं वे लोग जो कहते हैं

यह मेरा ज्ञान है और

समाज तथा प्रकृति को नकारते है

उसका अपना कुछ भी नहीं

उसने अब तक जो भी पाया है

अथवा आगे जो भी पायेगा

वह समाज और प्रकृति से ही पायेगा

ज्योति, अग्नि अथवा जल

ध्वनि, .विद्युत अथवा स्वर

आकर्षण और प्रत्याकर्षण

सभी कुछ है प्रकृति का गुण

सभी कुछ प्रकृति के कारण है

रिक्तता भी प्रकृति के कारण है

जिसे हम काल कहते है

वह प्रकृति से ही जाना जाता है

हम नहीं कर सकते प्रकृति के बिना

किसी भी वस्तु अथवा कार्य की कल्पना

प्रकृति के बिना नहीं है कुछ भी संभव

प्रकृति के बिना नहीं किसी का अस्तित्व

न जीव का, न किसी निर्जीव का

और न ही किसी अन्य शक्ति का

प्रकृति के बिना किसी भी गुण का

कहीं कोई अस्तित्व नहीं है

न अल्लाह का, न भगवान का

और गॉड का भी अस्तित्व नहीं है

प्रकृति यथार्थ है

प्रकृति पदार्थ है

पदार्थ कभी नष्ट नहीं होता

उसका कभी विनाश नहीं होता

प्रकृति ही चुंबक है

प्रकृति ही उर्जा और गति है

प्रकृति ही जमीन है

और प्रकृति ही आसमान है

प्रकृति में कुछ भी स्थिर नहीं

प्रकृति सदैव ही गतिमान है

प्रकृति ही धर्म है

प्रकृति ही कर्म है

प्रकृति के बिना कहीं भी

नहीं किसी का मर्म है

ये नदियाँ, ये पहाड़ हैं प्रकृति

ये समुद्र और ये तारे हैं प्रकृति

ये पेड़ पौधें हैं प्रकृति

ये घने जंगल हैं प्रकृति

ये आकाश गंगायें हैं प्रकृति

हम सभी हैं प्रकृति

हमारे भाव भी हैं प्रकृति

घृणा और द्वेष हैं प्रकृति

ईर्ष्या और प्यार है प्रकृति

क्या नहीं है प्रकृति

सभी कुछ है प्रकृति

सभी कुछ है प्रकृति ।

हरी सिंह किन्थ

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