अधिकार मिल कर ही रहेगा

गर बज गया है बिगुल संघर्ष का,

तो अधिकार मिलकर ही रहेगा ।

कोई न मुझको रोक सकेगा शक्ति से डरा धमका कर,

कदम न मेरे मोड़ सकेगा झूठे स्वप्न दिखाकर ।

अब तो दम लेंगे हम अपनी मंजिल पर ही जाकर,

ली है हमने शपथ संघर्ष का बिगुल बजाकर ॥

गर चल पड़ा है यह कारवां,

तो अब मंजिल पर ही ठहरेगा ।

गर बज गया है बिगुल संघर्ष का,

तो अधिकार मिलकर ही रहेगा ॥

अधर्म के प्रति धर्म का यह संघर्ष नहीं है,

किसी राजा के प्रति प्रजा का यह संघर्ष नहीं है ।

यह संघर्ष है बस, आदमी और इंसान का,

यह संघर्ष है बस, मान और सम्मान का ॥

गर खाई है हमने कसम,

तो सम्मान अब मिलकर ही रहेगा ।

गर बज गया है बिगुल संघर्ष का,

तो अधिकार मिलकर ही रहेगा ॥

अब चाहे पहाड़ ही सामने क्यों न राह में आ जाये,

जो कदम चल पड़े हैं मेरे, उन्हें रोक ना पायेगा ।

सागर स्वयं महासागर बन मुझे डुबोना चाहेगा,

मैं तैरूँगा पुष्प समान, मुझे डुबो ना पायेगा ॥

गर निकली है कोंपल कमल की,

तो फूल अब खिलकर ही रहेगा ।

गर बज गया है बिगुल संघर्ष का,

तो अधिकार मिलकर ही रहेगा ॥

हरी सिंह किन्थ

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