यह कैसी इन्सानियत है

यह कैसी इन्सानियत है जिसमें न किसी को शर्म आये
सुनी एक ऐसी खबर जिससे कि सबका दिल दहल जाये
वैसे तो ऐसी खबर अक्सर हर रोज सुनाई देती हैं
नारी पर अत्याचार, बलात्कार की चीख सुनाई देती हैं
यहाँ एक तरफ माँ बैठी दिखाई जाती है शेर पर
तो दूसरी माँ बच्चे को जन्म देती है कचरे के ढेर पर
एक तरफ शेर पर बैठी महिला के आठ हाथ दिखाई देते हैं
दूसरी महिला के आँचल को खींचते दस हाथ दिखाई देते हैं
यह कैसी अजीब सी दिखाई देती, देश की तस्वीर है
जहाँ भूखा मनुष्य को मारती, खुद उसकी ही तक़दीर है
जहाँ बच्चे खोज रहे बचपन को, युवक हुआ बेकार है
वृद्ध जहाँ असहाय हुए , यह कैसा हुआ विकार है
एक ग़रीबी की धरती पर लेटा, दूजा दौलत के पहाड़ पर
एक मनुष्य पैदल ही चलता, दूजा चले जहाज़ पर
बहुतों को मिली दुखों की दुनियाँ, कुछ को खुशी अपार है
आँख मूंदकर ईश्वर बैठा, यहाँ दिखता न उसे संसार है
दुनियाँ को बनाये सुन्दर जो, वह तो बस मजदूर है
दौलतमंद करे बदरंग इसे, बनकर दुष्ट, क्रूर है
धर्म के नाम पर ख़ाके जिसका, मोटा हुआ शरीर है
वो ऐश करे सारी दुनियाँ में और नंगा फिरे फ़क़ीर है

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देश की तस्वीर

देश अनेकों जाकर तुमने, भारत की शान बढ़ाई
मोदी-मोदी बोल रहे हैं, हर देश में एन०आर०आई
लंका में जाकर के मोदी, तुमने पुरानी कथा सुनाई
किया राम गुणगान वहाँ पर, रावण की याद दिलाई
चन्द क्षणों में किया फ़ैसला, ऐसे तुम हो संज्ञानी
नेपाल में तुरंत रसद पहुँचाई, मालद्वीप में पानी
बुरे वक्त में साथ दिया और मदद करी मनमानी
सेना को भी भेजा तुमने, ऐसे हो वीर बलदानी
पर मेरे देश की प्यारी जनता, हाय तुम्हारी यही कहानी
तरसे बूँद-बूँद को विदर्भ वासी, नहीं मिला उन्हें था पानी
भूख से व्याकुल जनता मर गई, नहीं पहुँचा कोई दानी
ऐसे थे हालात यहाँ पर, जिसका ना था कोई सानी
अरब-अमीरात में जाकर मोदी, मंदिर खातिर जगह दिलाई
हो भारत का कॉलेज वहाँ पर, नहीं याद तुम्हें थी आई
सुलझाया विवाद सीमा का, बंगलादेश में जाकर शान बढ़ाई
यहाँ जाति-पाँत और धर्म पर लड़ रहे, आपस में भाई-भाई
स्वच्छ भारत को करने की, थी कसम आपने खाई
भरी गंदगी दिलों के अंदर, थी कभी याद ना आई
कालाधन, भृष्टाचार मिटाने को, आगे कदम बढ़ाया
ये दोनों तो मिटे नहीं पर, आगे व्यापम आया
खाता खुलवा दिया बैंक में, ऐसा कार्य महान किया
आयेगा पैसा कहाँ से इसमें, इस पर नहीं था ध्यान गया
खाता खोलकर खुशी मनाले, भारत की जनता प्यारी
दाल, प्याज की क्या ज़रूरत, यह तो बड़ी बीमारी
हिंदू देश बनाने की भारत को, थी कसम आपने खाई
भुला दिया है यहाँ पर रहते, मुस्लिम,बौद्ध,सिख,ईसाई

अनाथ

मेरी भी एक मां तो होगी

पर मैं मां का लाल नहीं,

जिस कोख ने मुझको जन्म दिया

मैंने पाया उसका प्यार नहीं,

जन्म दिया और फेंक दिया

फिर पूछा मेरा हाल नहीं,

पाकर जन्म हरामी कहलाया

मां – बाप का पाया नाम नहीं,

वह शैतान पुरुष आबारा था

जिसने मां को मजबूर किया,

मां की भी मजबूरी देखो

जिसने इतना मुझको दूर किया,

भगवान भी कोई आबारा होगा

जिसने धरती मां को मजबूर किया,

धरती मां की भी मजबूरी

जिसने बना मुझे मजदूर दिया,

जननी, धरती तनया समान हुई

वीर भोग का सामान हुई,

जैसे चाहा भोगा उसने

क्यों आया उसको काल नहीं,

मेरी भी एक मां तो होगी

पर मैं मां का लाल नहीं

हरी सिंह किन्थ

अधिकार मिल कर ही रहेगा

गर बज गया है बिगुल संघर्ष का,

तो अधिकार मिलकर ही रहेगा ।

कोई न मुझको रोक सकेगा शक्ति से डरा धमका कर,

कदम न मेरे मोड़ सकेगा झूठे स्वप्न दिखाकर ।

अब तो दम लेंगे हम अपनी मंजिल पर ही जाकर,

ली है हमने शपथ संघर्ष का बिगुल बजाकर ॥

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ऐसा साहित्य लिखो

ऐसा साहित्य लिखो,

भिक्षु को देखो ।

वह जाता,

दो भाग कलेजे के करता, पछताता पथ पर जाता ।

आँत, पेट, पीठ मिलकर हैं एक,

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दुश्मन – दोस्त

ऐ दोस्त दोस्ती के काबिल न छोड़ा तैने,
वो कर दिखाया जो कभी न सोचा था मैंने
वो बचपन की सारी रातें,
जीवन की वो लंबी बातें
बातों को भी भुलाकर छोड़ा तैने
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पिया का प्यार

रमणी बैठी द्वार पै, लखै पिया की वाट

वर्षा उसकी बैरिन भई, भिगो गई सब गात

रमणी पिया की याद में, बैठी मन को मारि

तन बदन की सुध नहीं, पागल भई सुकुमारि

बादल छाये गगन में, चंचल बहति बयारि

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वह निश्चित ही मजदूर है

मेरे सामने खड़ा जो मौन है,

भला बताओ तो, यह कौन है ?

इसके जीवन में धूप ही धूप है, मगर उजाला नहीं

इसके जीवन में घुप्प अंधेरा है, मगर दिल कला नहीं

आँखों में इसके मोती ही मोती है, मगर गले में माला नहीं

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देश के गरीब किसानों से

कहनी है एक बात हमें देश के गरीब किसानों से

कहनी है एक बात हमें देश के मजदूर जवानों से

कष्टों की पहनी माला तुमने, तन माटी में मिला गये

पृथ्वी माँ से प्यार किया और पृथ्वी माँ में समा गये

सोते खेत जगा कर तुमने वहाँ पर अन्न उगाए

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